Skip to main content

बोझिल बचपन...!!!










झुलसी नन्हे बचपन की फुहार, सिमटता नन्हे सपनो का संसार..!
हर समय मजबूरी का चोला ओढ़े, झेलते स्वार्थी  समाज का तिरस्कार...!!

वो नन्हा मटमैला सा मासूम, जिस पर छाई मजदूरी की धुप...!
न खिलोनो से खेले कोई खेल, न जाने कागज़ पेंसिल का आकार...!!

कभी चाय की दूकान पर बैठे, कभी स्टेशन तो कभी कारखाना...!
कभी सडको पर पत्थर वो तोड़े, छोटे हाथो में लिए बड़े औजार...!!

दिन के भूख की चिंता वो करते, साथ पढने की इच्छा भी गढ़ते...!
बस दो रोटी से पेट भरने को, दिन भर मजदूरी को भी तैयार..!!

कितने ही कानून मढ़े गये, करने को बाल श्रम का सुधार..!
फिर भी सवाल बना हुआ है, कैसे होगा बोझिल बचपन का उद्धार..!!



Comments

  1. उम्दा सोच
    भावमय करते शब्‍दों के साथ गजब का लेखन ...आभार ।

    ReplyDelete
  2. कुछ दिनों से बाहर होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका

    ReplyDelete
  3. फिर भी सवाल बना हुआ है, कैसे होगा बोझिल बचपन का उद्धार..!!
    सही कहा है आपने जब तक हम नहीं सुधरेंगे तब तक किसी सुधार की कल्पना नहीं की जा सकती .....प्रेरक रचना आपका आभार ....!

    ReplyDelete
  4. Very Nice Thinking who shows ur pain abt blak part of our society's situation

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

एक कदम और चलते है ।

आ चल एक कदम और चलते है ।  दूर डगर नापने की बात करते है ॥  फूलो को हाथो में समेट,  पानी से आकाश की रंगोली भरते है।। 
एक कदम और चलते है ।।
आ मिल शाम को भोर बनाये।  आ मिल जोर से शौर मचाये ॥  सुरों को धुनों की मिटटी से मलते है , आ चल एक कदम और चलते है ।।
.....................  साथ चलते है ॥ 

निश्चय..!!

प्रारंभिक भोर में लिया दृढ़ निश्चय,

शंध्या आते विफलता की चौखट लांघ लेता है.!!

प्रतिबिम्ब सा मन ओज से भरा,

परिस्तिथियों से तल्लीन खुद को अधीन बना लेता है। !!

दुविधा...!!!!

मन ऐसो मेलन भरा, ते तन सुच्चो कैसो कहाय ...!
जे सोचु हरी ते पाप हरे, ते पूजन न सुहाय ...!!
ऐसो दुविधा सांस लगी, न निति कोई सुझाय ...!
तर जाऊ मैं पाप ते, या खुद ने देउ डुबोय ....!!