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सुबह.. !!!

आज सुबह उदास सी हैं... न जाने क्यों. कुछ चुपचाप सी है. आँखों में बंद पानी लिए.. आज सुबह कुछ ख़ास सी है.. शायद वो रात भर सो नहीं पाई.. तभी इतनी बदली हुई सी हैं.. या शायद किसी ने दिल दुखाया है. तभी इतनी मायूस सी हैं.. ऐसा क्या हुआ उसके साथ क्यों किसी को कुछ नहीं बताती.. या फिर कोई उसे समझ ही नहीं सकता. तभी अपनी तकलीफ नहीं दिखाती..!! आज सुबह उदास सी हैं... न जाने क्यों. कुछ चुपचाप सी है.!!!

न भेजो प्रभु ....!!!

न भेजो ऐसे द्वार प्रभु...! जहां चोखट न लांघ पाऊ...!! न कदमो को रोक सकू मैं...! बस  दरवाजे की सांकल बन जाऊ...!! न भेजो ऐसे परिवार प्रभु...! जहां जन्म से ही पराई कहाऊ...!! माँ बाबा को बोझ लागु मैं...! जहां  मौल से मैं ब्याही जाऊ...!! न भेजो ऐसे संसार प्रभु...! जहां खुद को सलामत न पाऊ...!! हर एक  आँख  से घूरी जाऊ मैं..! और हर गली मैं दबोची जाऊ...!! न भेजो ऐसे अन्धकार प्रभु...! जहां  अंधे लोगो में गिनी जाऊ...!! रौशनी भरने की कोशिश करू मैं...! या खुद आग मैं जला दी जाऊ....!! न भेजो प्रभु .. न भेजो....!!! हम हमेशा कहते है.."SAVE GIRLS", " STOP FEMALE FOETICIDE".. पर क्या कभी आपने  सोचा है.. हम जिस बेटी को दुनिया में लाना चाहते है .. क्या वो हमारी दुनिया में सुरक्षित है..???

ख़ामोशी..!!!

होती ख़ामोशी से कुछ बात रात  के साथ..! फैले हुए सन्नाटे को सुन के चुप्पी के साथ..!! सोचती हूँ कभी ख़ामोशी के बारे में.. जो चुप रहती है हर पल... और  जो सिमट जाती है हर रात के साथ...!! न अपने मन की बताती है... बस खो जाती है अँधेरे के साथ...!! कभी सोचा है तुमने.??? ये क्या चाहती है.??? चाहती है कुछ झिलमिलाहट चमकते चाँद के साथ...! अँधेरे को बदलना बिखरते उजाले के साथ..!! और क्या चाहती है जानते हो.??? अपनी चुप्पी को तोडना मुस्कराहट के साथ...! और गुजार देना सारी उम्र तुम्हारे साथ के साथ...!!

Beautiful Verse by Guru Nanak....!!!

From woman man is born Within woman man is conceived To woman he is engaged and married Woman becomes his friend Through woman the future generation come When his woman dies, he seeks another woman To woman he is bound So why call her bad? From her kings are born From woman woman is born Without woman there would be no one at all.                                  : By Guru Nanak Stop murder in womb.

तेरी इच्छा शक्ति..!!!

लगा ठोकर हर उस पत्थर को .. जो सामने आये तेरे.. हर रस्ते को अपनी लगन से सजा .. न डर गिरने से .. जब मैं हूँ साथ तेरे...!!! पथ को पैरो से नाप चल तू.. अपनी उम्मीद की बाहों को बड़ा ले.... फूल समझ काँटों पे चल तू.. न डर मुरझाने से ..जब मैं हूँ साथ तेरे...!!! उठा निगाहे, आसमां पे टिका.. न दबा चाह को धरती के बोझ से.. बस उड़ने दे सपनो को मन की उड़ान से .. न डर टूटने से.. जब मैं हूँ साथ तेरे...!!! बड़ा हाथ अपने धूप को पकड़ ले .. मुट्ठी में सूरज को बंद कर ले.. अँधेरे को डरा अपने इशारो पे.. न डर जलने से.. जब मैं हूँ साथ तेरे...!!! हस के कर सामना हर मुश्किल से... दूर कर उदासी को अपने चेहरे से... थाम लूगी तेरा हाथ, मैं हर मोड़ पे . न डर रोने से ....जब मैं हूँ साथ तेरे...!!! तेरी इच्छा शक्ति..!!!

मैं भी खिलना चाहती थी...!!

तेरे आँगन में चेहेकना चाहती थी... ऊँगली थाम चलना चाहती थी...! तेरी ममता की छाव में... माँ मैं भी खिलना चाहती थी...!! मैं बेठी थी अँधेरे में आंख मूंद के, प्यारे से सपने लिए...! पायेगी तू मुझे ढूंढ़ के एक प्यारी सी मुस्कान लिए...!! तेरे आँचल से खेलना चाहती थी... माँ मैं भी खिलना चाहती थी...! न पापा को था प्यार मुझसे.. दादी भी थी पोते की आस लिए...!! डरते थे दोनों ही मुझसे... कही आ न जाऊ घर बसने के लिए...! पापा की दुलारी बनना चाहती थी... माँ मैं भी खिलना चाहती थी...!! बनाते सब तरकीबे... मिलते डॉक्टर ओझा से तुझको साथ लिए...! जो थे तैयार मुझे मरने को... बेठे हाथो मैं हथियार लिए....!! सबकी दुनिया देखना चाहती थी.. माँ मैं भी खिलना चाहती थी...! तुझको महसूस किया मैंने... तुझसे ही सांस ली बस दो पल के लिए...!! होता सुकून मुझको अगर रहती साथ मेरे तू जिन्दगी भर के लिए...! तेरी गोदी में सिर रख के सोना चाहती थी.. माँ मैं भी खिलना चाहती थी...!! Stop murder in womb....

बोझिल बचपन...!!!

झुलसी नन्हे बचपन की फुहार, सिमटता नन्हे सपनो का संसार..! हर समय मजबूरी का चोला ओढ़े, झेलते स्वार्थी  समाज का तिरस्कार...!! वो नन्हा मटमैला सा मासूम, जिस पर छाई मजदूरी की धुप...! न खिलोनो से खेले कोई खेल, न जाने कागज़ पेंसिल का आकार...!! कभी चाय की दूकान पर बैठे, कभी स्टेशन तो कभी कारखाना...! कभी सडको पर पत्थर वो तोड़े, छोटे हाथो में लिए बड़े औजार...!! दिन के भूख की चिंता वो करते, साथ पढने की इच्छा भी गढ़ते...! बस दो रोटी से पेट भरने को, दिन भर मजदूरी को भी तैयार..!! कितने ही कानून मढ़े गये, करने को बाल श्रम का सुधार..! फिर भी सवाल बना हुआ है, कैसे होगा बोझिल बचपन का उद्धार..!!