Skip to main content

रौशनी........!!!!!!!

सोचा आज के चलो....

सूरज की रौशनी में खुद को भिगो देते है.....

आँखों को आज खुशियों से डुबो देते है....

फेला के अपने दोनों हाथ ..

खड़े हो गये...

उसे देखने को...

की कब उसकी नजर हम पर पड़ेगी...

और मेहरबान होकर मुझ पर बरसेगी...

हाथो को तैयार रखा था..

मुट्ठी में बदलने को...

उसकी रौशनी को ... समेटने को.....

आंखे बंद किये खड़े थे इंतजार में .....

की.....

एक अंधियारी सी महसूस हुई.

जब देखा तो एक बादल....

मेरी खुशियों के बीच आ चूका था .....

और एक ही पल में ....

बरस पड़ा मुझ पर.....

उसके पानी में ही मेरे आसू भी बह गये...

और हम वही पर तरसे से ही रह गये.....

हमारी किस्मत में एक रौशनी भी नसीब नहीं .....

हम फिर उसी अँधेरी राह पे गुम होके चल दिए.....



Comments

  1. dubara kiya hai comment but ab yaad nai aa raha pichli baar kya kiya tha
    phir bhi i would like to say sachi heart touching hai.......

    ReplyDelete
  2. Dil ko Chou gaya hai aapka yai ahsaas. Roshni ho ya pani haatho may sametena to mushkil hai dono ka. Koshish hum fir bhi kartay hai dil ki tassalli kay liye. bahut khoob Anandji :)

    ReplyDelete
  3. काफी अच्छे से शब्दों को उकेरा है आपने .... i like it

    ReplyDelete
  4. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।

    ReplyDelete
  5. कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...
    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो NO करें ..सेव करें ..बस हो गया........

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

न भेजो प्रभु ....!!!

न भेजो ऐसे द्वार प्रभु...! जहां चोखट न लांघ पाऊ...!! न कदमो को रोक सकू मैं...! बस  दरवाजे की सांकल बन जाऊ...!! न भेजो ऐसे परिवार प्रभु...! जहां जन्म से ही पराई कहाऊ...!! माँ बाबा को बोझ लागु मैं...! जहां  मौल से मैं ब्याही जाऊ...!! न भेजो ऐसे संसार प्रभु...! जहां खुद को सलामत न पाऊ...!! हर एक  आँख  से घूरी जाऊ मैं..! और हर गली मैं दबोची जाऊ...!! न भेजो ऐसे अन्धकार प्रभु...! जहां  अंधे लोगो में गिनी जाऊ...!! रौशनी भरने की कोशिश करू मैं...! या खुद आग मैं जला दी जाऊ....!! न भेजो प्रभु .. न भेजो....!!! हम हमेशा कहते है.."SAVE GIRLS", " STOP FEMALE FOETICIDE".. पर क्या कभी आपने  सोचा है.. हम जिस बेटी को दुनिया में लाना चाहते है .. क्या वो हमारी दुनिया में सुरक्षित है..???

बोझिल बचपन...!!!

झुलसी नन्हे बचपन की फुहार, सिमटता नन्हे सपनो का संसार..! हर समय मजबूरी का चोला ओढ़े, झेलते स्वार्थी  समाज का तिरस्कार...!! वो नन्हा मटमैला सा मासूम, जिस पर छाई मजदूरी की धुप...! न खिलोनो से खेले कोई खेल, न जाने कागज़ पेंसिल का आकार...!! कभी चाय की दूकान पर बैठे, कभी स्टेशन तो कभी कारखाना...! कभी सडको पर पत्थर वो तोड़े, छोटे हाथो में लिए बड़े औजार...!! दिन के भूख की चिंता वो करते, साथ पढने की इच्छा भी गढ़ते...! बस दो रोटी से पेट भरने को, दिन भर मजदूरी को भी तैयार..!! कितने ही कानून मढ़े गये, करने को बाल श्रम का सुधार..! फिर भी सवाल बना हुआ है, कैसे होगा बोझिल बचपन का उद्धार..!!

जिन्दगी...........!!!!

कभी हसती हूँ..... तो कभी रोती हूँ ......!! तो कभी खुद को सांत्वना देती हूँ ......!! फिर दूजे ही पल खुद को बेसहारा पाती हूँ ......!! पता नहीं क्यों अब तो हर चीज को मुझसे बेर सा हो गया है......!! कहने को तो अपना पर.. नसीब ही गैर सा हो गया है.....!! कभी कोसती हूँ ओरो को जो मुझे समझ नहीं पाते ......!! तो कभी खुद को जो कभी सफल नहीं हो पाती हूँ ..........!! आईने में देखती हूँ खुद की ही आँखों को....!! कोरो में फसी पानी की बूंदों को .........!! या फिर यूँ कहिये..आँखों से ओझल हसी को ढूंडती हूँ......!! तो कभी खुद से ही घिन्ना के खुद को भी नहीं निहार पाती हूँ......!! अब तो एक एक पल बहूत भरी सा लगता है.......!! रात को सुबह कर और सुबह को रात का इंतज़ार रहता है.....!! मन में बस यही बात रहती है.......!! किसी तरह ये रात कट जाये ....... !! बस किसी तरह ये दिन निकल जाये.......!! जिन्दगी ने इतनी ठोकर दी है.....!! की अब तो जीने की वजह भी नहीं ढूंड पाती हूँ.......!!